Sunday, 5 September 2010

एक फूल की याद जो मुर्झा गया

एक फूल की याद जो मुर्झा गया
कार में प्रवेश करते ही आँखें और नाक किसी परिचित की तलाश करने लगीं. पर वह चीज अपने स्थान पर न थी. आज तीसरा लगातार  दिन था, जब वह लड़का नहीं आया था.
मैं कार ड्राईव  कर रहा था; पर मष्तिस्क उस लड़के को याद कर रहा था. मुझे याद आयी- उससे पहली मुलाक़ात. रोज़ की तरह नौकर ने कार गेट से बाहर निकाल दी थी. मैं अपना सूटकेस  बगल वाली सीट पर रख अगली सीट पर बैठने ही जा रहा था  कि  पीछे से आवाज आयी- साहब पेपर ले लो, एक पेपर ले लो. यूँ मैं इन स्ट्रीट लड़कों  पर ध्यान नहीं देता ; पर उस लड़के में मेरे लिए कुछ अपनेपन की चीज थी कि मैं उसकी ओर आकर्षित हो गया और बोल बैठा - नहीं पेपर नहीं लेना है, हमारे यहाँ खुद पेपर आता है.
वह बोला- साब, आपके यहाँ तो अंग्रेजी पेपर आता होगा, एक हिंदी ले लीजिये.
मैं मुस्कुरा पड़ा और बोला- नहीं. वह लड़का घूमकर जाने लगा. अचानक मुझे वह चीज मिल गयी, जिसे मैं ढूंढ़ रहा था.
मैं बोल पड़ा- सुनो ये फूल तुम कहाँ से लाये. ये तो यहाँ नहीं मिलते.
नहीं साब, सुबह जिधर से पेपर लाने जाता हूँ, उधर ही एक पेड़  है उसका, उधर से ही लाया. क्या आपको पसंद है यह.
हाँ है तो पर ......
तो यह लीजिये साहब और उसने अपने कमीज़ के बटन के काज में फंसकर रखे फूलों की डाली से एक गुच्छा तोड़कर मेरे हाथ में थमा कर जाने लगा. मैंने उसे रुकने को कहा और एक रुपये का सिक्का देने लगा तो उसने मना  कर दिया. तब मैंने उससे एक अखबार खरीद लिया. फिर तो उसका यह क्रम ही बन गया. रोज़ ही मेरा नौकर कार गेट के बाहर निकाल कर  खड़ी करता और वह लड़का उधर से गुजरते वक्त उन फूलों का एक गुच्छा  खिड़की के रास्ते  स्टीयरिंग के पास रख जाता. कभी- कभी उससे भेंट हो जाती तो उसे एक हिंदी अख़बार खरीदने के बहाने से एक सिक्का दे देता.
यह क्रम उसका तब भी नहीं टूटा  जब  मैं कुछ दिनों के लिए बीमार हो  गया था और कार  नहीं निकाली जाती थी या जब मैं कुछ दिनों के लिए एक सेमिनार में भाग लेने दूसरे शहर गया हुआ था. वह मेरे नौकर को फूलों का गुच्छा  दे दिया करता और नौकर उसे मेरे सिरहाने गुलाबदान  में सजा देता.
इस तरह करीब एक साल से मेरे जीवन  हर एक  दिन का हर पल उन फूलों की  सुगंध से महक रहा था. आज मैंने खुद सुबह से रास्ते  पर नजर रखी थी, पर वह गुजरा ही नहीं था.
मेरे दिमाग में एक बात आयी- कहीं उसे कुछ हुआ तो नहीं. फिर दिमाग ने कहा - हो सकता है उसने कहीं दूसरा कोई काम - धंधा शुरू कर लिया हो या सोचा हो कि कौन जाता है  रोज-रोज मुफ्त के फूल पहुँचाने.  
इन सब विचारों से कुछ तसल्ली तो हुई पर दिल को चैन नहीं पड़ा. जब मैं वापस घर लौट रहा था तो मैंने गाड़ी उसकी बस्ती की ओर मोड़ दी. एक बार उसने बताया था कि  वह पुल के पार वाली झुग्गी बस्ती में रहता है.
मुझे गाड़ी बस्ती के बाहर ही रोकनी पड़ी. सामने कूड़े का बड़ा ढेर और सड़े पानी के कीचड़ को देखकर मन एक बार भिन्न  गया. कर का दरवाजा लॉक  कर मैं बस्ती की  ओर बढा . वहीँ पर चाय की एक दूकान थी, जहाँ  आडियों  पर कोई फ़िल्मी गीत बज रहा था. मैंने चाय वाले से पूछा- बता सकते हो एक लड़का कहाँ रहता है, काले रंग का है, गाल पर एक माशा है और अख़बार बेचता है.
वहीँ पर खड़ा एक आदमी बोल पडा - आप चीकना को खोज रहे हैं क्या? 
मैं बोला - हाँ, शायद यही उसका नाम है, उसके गाल पर एक माशा है.
- हाँ हाँ चीकना, साहब.
चलिए साहब मैं आपको उसके झोपडी तक लिए चलता हूँ. मैं उस व्यक्ति के साथ साथ सिगरेट सुलगाकर पीता हुआ चलने लगा. वह आदमी कह रहा था - साहब, उसकी तबीयत तो बहुत खराब है.
क्यों क्या हुआ है, उसे?
होना क्या है साहब. टी बी   हुआ होगा. बाप को भी टीबी था एकाध साल पहले गुजर गया.
"और माँ " मैंने पूछा .
माँ तो बचपने में गुजर गयी थी.
वह एक झोपड़ी के समीप रूककर अन्दर घुस गया, यह कहते हुए की यही है. मैंने सिगरेट नीचे गिराकर पैर से मसाला और झुककर उसके पीछे-पीछे अन्दर घुस गया. उस आदमी ने खाट पर लेटे किसी को लक्ष्य करके पुकारा-चीकना, देख तो कौन आया है.
मैं पास गया तो देखा वही लड़का था. मैं खाट पर बैठकर उसका हाथ पकड़कर नब्ज टटोलने लगा. नब्ज डूब रही थी. मेरे हाथों का स्पर्श पाकर उसने आँखें खोलीं और मुझे देखकर वह हल्के से मुस्कुरा दिया. उसने कुछ बोलना चाहा, पर बोल न सका. उसके मुँह से रक्त की एक रेखा निकल पडी. मैं बाहर निकल कर गाड़ी की ओर लपका और अपने सूटकेस के साथ लौटा और उसे एक इंजेक्सन  लगाया. पर उसने फिर आँखें न खोलीं.  उसने बड़ी शांति से शरीर त्याग दिया था. मेरा मन उदासी से भर गया. मैं ना में सर हिलाता झोपड़ी से बाहर निकल आया. वह आदमी भी पीछे-पीछे बाहर निकल आया. मैं उसकी ओर देखकर पूछा- अब क्या करोगे? 
उसने कहा- साहब, इसका कोई तो है नहीं, जो बुलवा भेजें. हम बस्ती वाले ही कुछ चंदा इकट्ठा कर इसका क्रिया-कर्म कर देंगे. मैंने जेब से दो सौ रुपये निकालकर उसे दिए और कहा - रख लो, काम आयेंगे और चल पड़ा. 
जब मैंने कर में बैठकर दरवाजा बंद किया तो अचानक मेरी नज़र एक छोटे से मुरझाये फूल पर पड़ी जो कार के शीशे के पास कोने में अटका पड़ा था. शायद नौकर के द्वारा कार साफ़ करते समय अटककर  वहीँ रह गया था . मैंने उसे अपनी डायरी   में हिफाज़त से रख लिया.
वह  फूल आज भी उस डायरी के एक पन्ने पर चिपका रखा है. 

Saturday, 4 September 2010

कुछ रह गया

कुछ रह गया
दुनिया बदल गयी, इंसान बदल गया,
पर हाय, नाड़ी में बहता लहू वही क्यों रह गया?
माली बदल गया, फूल बदल गया,
पर हाय, पेड़ों पर फलता कहानी वही क्यों रह गया?
नाम बदल गया, पहचान बदल गया,
पर हाय, दिलों-दिमाग पर सोता मेहमान वही क्यों रह गया?
मंदिर बदल गया, पुजारी बदल गया,
पर हाय, मंदिर में बैठा भगवान वही क्यों रह गया?

स्वतंत्रता भारत की

स्वतंत्रता भारत की
गाँधी का चरखा घूमता है .
लन्दन का तख़्त दहलता है.
गोरा काला बन जाता है.
काला गोरा बन जाता है.
दिल का भगवान बदलता है.
हुक्म का मिजाज बदलता है.
स्याही का रंग बदलता है.
कलामों का राग बदलता है.
तब किसी का मौन बदलता है.
क्योंकि गाँधी का चरखा चलता है.
मजलूमों का ख्याल बदलता है.
जुल्मी   का अंदाज़ बदलता है.
दुश्मन का प्यार बदलता है.
इकरार - ए- तकरार बदलता है.
दर्पण का सच बदलता है.
हमजोली का ईमान बदलता है.
मुसाफिर अपनी राह बदलता है.
हमदर्दी का पड़ाव बदलता है.
फिर तो भारत का भाग्य बदलता है.
गाँधी का चरखा घूमता है.
शांति- प्रेम-अहिंसा  का मंत्र निकलता है.
पर माँ के आँसू का सबब बदलता है.
क्योंकि अपनों का अरमान बदलता है.
शासन का दिमाग बदलता है.
बन्धु का हित बदलता है.
फिर तो हिमाचल का हिय बदलता है.
प्राचीर पर रंगों का आकार बदलता है.
थामने वाले हाथों का व्यापर औ' आकार बदलता है.
फिर तो गाँधी का चरखा भी बदल जाता है.
स्वदेशी के बदले इम्पोर्टेड लेबल  आता है.