Wednesday, 21 November 2018

पड़ोसी


पड़ोस में गाने बज रहे थे, सुबह से ही । डॉ० कोटनिस को आश्चर्य हुआ क्योंकि इस बड़े शहर में उन्होंने कभी भी किसी अपार्टमेंट में गाने बजते हुए सुने नहीं थे । वैसे उन्हें इस शहर में आए अभी कुछ ही दिन हुए थे। बगल में अपार्टमेंट था, बिल्कुल उस घर की बगल में जहाँ वे किराये में रहते थे । वे दूसरी मंजिल पर रहते थे । बगल के अपार्टमेंट से उनका रिश्ता बस यह था कि अपार्टमेंट की पहली मंजिल का सामने के फ्लैट का किचन, हॉल और हाँ बॉथरुम भी उनके बॉलकनी के ठीक सामने पड़ता था । अत: कोई सामने रहने वाला कुछ गलत न समझ ले, इसलिए वे सामने के कमरे की खिड़कियों के पर्दे सदा लगाए रहते थे । उन्होंने दिमाग पर बिना अधिक जोर दिए, अपना काम जारी रखा । तैयार होकर वे ऑफिस चले गए । ऑफिस से लौटने पर उन्हें अपने प्रश्न का जवाब मिल गया । अपार्टमेंट के बाहर शुभ विवाह का बोर्ड लगा था। उन्हें कोई आमंत्रण नहीं था । अब उन्होंने समझा कि अपार्टमेंट वालों के लिए पड़ोसी सिर्फ अपार्टमेंट में रहने वाले ही होते हैं । दिन बीतते गए।
एक दिन अचानक रात के दो बजे उनकी नींद टूट गई । सामने वाले फ्लैट से रोने और लोगों के बोलने के शोरगुल हो रहे थे। उन्होंने फिर सोने की कोशिश की, आखिर वे उनके पड़ोसी तो थे नहीं । पर जब रोने की आवाजें तेज होने लगीं तो वे अपनी बिल्डिंग से नीचे होकर उस अपार्टमेंट में उस फ्लैट के सामने जा पहुँचे । कई लोग वहाँ जमा थे । पता चला कि उस फ्लैट में एक बुजुर्ग महिला और उनके पति रहते हैं । उनकी पुत्री शादी के बाद बगल के किसी शहर में है । पुत्र दिल्ली में है । बुजुर्ग को शायद दिल का दौरा पड़ा था। महिला अपने को असहाय पाकर लगातार रो रही थी । पड़ोसी सलाह और तसल्ली देने और किसी एंबुलेंस की व्यवस्था की जुगत में लगे थे। अचानक डॉ कोटनिस को ख्याल आया कि उनके सहकर्मी योगेश शर्मा जी का पुत्र बगल के एक बड़े अस्पताल में डॉक्टर है। डॉ० कोटनिस ने तत्काल शर्मा जी को फोन लगाया और सारी बात समझाई । मिनटों में एंबुलेंस आ गई । बुजुर्ग को एंबुलेंस पर लाया गया। उनकी पत्नी एंबुलेंस में उनकी बगल में बैठ गई और पड़ोसियों की ओर आस भरी नजर दौड़ाई । पर साथ जाने के नाम पर सभी बगलें झाँकनें लगे । डॉ० कोटनिस को बात समझ में आते ही ख्याल आया कैसे उनके पिता की तबीयत खराब होने पर जब उनकी बहन उनके पिता को अस्पताल ले जा रही थी तो उसका साथ देने वाला कोई नहीं मिला था । वे झट से एंबुलेंस में चढ़ बैठे । डॉ कोटनिस के साथ होने की वजह से अस्पताल में बुजुर्ग को अति विशिष्ट व्यक्ति की तरह इलाज मिला । सुबह पाँच बजे तक पीड़ित के पुत्री-दामाद आ पहुँचे । तब डॉ० कोटनिस वापस हो लिए। दो दिनों बाद डॉ० कोटनिस बुजुर्ग को देखने अस्पताल गए । शर्मा जी के पुत्र ने बताया कि बुजुर्ग की हालत अब काफी बेहतर थी और वह खुद उनका खास ख्याल रख रहा था। डॉ कोटनिस ने उसे धन्यवाद किया। जब डॉ० कोटनिस उन बुजुर्ग के पास पहुँचे तो उनके पुत्र-पुत्री ने उनका बार-बार धन्यवाद किया। डॉ० कोटनिस को एक अभूतपूर्व संतुष्टि की अनुभूति हुई । पर बुजुर्ग महिला उन्हें देखकर कुछ सोच रही थी और मानो शर्मिंदा हो रही थी । उसे ख्याल आ रहा था कि करीब तीन महीने पहले पुत्री की शादी के अवसर पर उन्होंने डॉ० कोटनिस को आमंत्रित करने की बात की थी तो कैसे उनके पुत्र और पति ने एक स्वर में कहा था कि वे उनके पड़ोसी थोड़े न हैं !

Tuesday, 20 November 2018

खूबसूरती


राकेश अपनी लेक्चरर बहन की शादी करवाने के लिए बहुत हाँथ-पाँव मार रहा था । पर बात कहीं बन नहीं रही थी । कहीं बात लेन-देन पर अटक जाती, कहीं नौकरी न छोड़ने की शर्त पर, तो कहीं लड़की की साँवली सूरत पर तो कहीं नौकरी के स्थांतरणीय न होने पर । लड़के वालों के कई जुमले तो हमेशा उसके कानों में सदा गुँजते रहते । शादी में हम तो कोई खर्च नहीं करेंगें न ! हमें तो मिल्की ह्वाईट लड़्की चाहिए । आपकी बहन लेक्चरर है तो क्या, हमारा लड़का भी तो सरकारी नौकरी में है, भले हि सिविल कोर्ट में क्लर्क है पर है तो सरकारी नौकरी ।रह-रह कर उसके कानों में अपने सहकर्मी की कही एक बात भी गुँजती – आजकल के लड़के और उनके घरवालों का कहना ही क्या ! उन्हें तो बस चाहिए – “मनी टाईट, अमेरिकन हाईट और मिल्की ह्वाईट”। ऐसे में माँ की आवाज उसे सहारा देती – “सब काम हो जाएगा, जब समय आएगा” ।
इस बार छुट्टियों में बहन जब घर आई तो उसने माँ से उसकी एक नई फोटो खींचवा देने की बात की क्योंकि वर्तमान फोटो पर वह कई जगह से ना सुन चुका था । पर बहन ने साफ मना कर दिया । जब वह छुट्टियों के बाद चलने लगा तो छोटी बहन ने लेक्चरर बहन का एक नया फोटो देते हुए उसे रख लेने को कहा । नया फोटो लेक्चरर बहन की किसी सहेली ने अपने मोबाईल से खींचा था और कहा था कि फोटो में वह अच्छी लग रही थी । राकेश को भी फोटो अच्छी लगी । वह फोटो को अपने फाईल में रख अपने काम की जगह पटना आ गया ।
अगले रविवार को हर रविवार की तरह उसने अखबार आते ही वैवाहिक विज्ञापनों का पन्ना खोल अपनी जाति के ’वधू चाहिए’ विज्ञापनों को खंगालने लगा । दो-चार उपयुक्त विज्ञापनों को लाल कलम से टिक करने के बाद उन विज्ञापनों में दिए फोन नंबरों पर बात करने में व्यस्त हो गया । समस्तीपुर के एक लड़के वाले ने फोटो, विवरणी और टीपण कुरियर से भेजने की बात की । राकेश ने अगले ही दिन उस नए फोटो की पाँच प्रतियाँ बनवाईं और उनमें से एक पुराने फोटुओं के साथ विवरणी व टीपण सहित कुरियर कर दिया । पाँच दिनों के बाद उसे आगे की बातचीत का बुलावा आया । उसे लगा कि यह नए फोटो का ही कमाल है । अगले रविवार को वह समस्तीपुर जा पहुँचा । लड़के के पिता ने उसका गर्मजोशी से स्वागत किया । फिर लड़के की माँ भी आ गई । चाय नाश्ते के साथ लड़के के पिता ने अपने उच्च घराने और लाखों की सम्पत्ति का ब्यौरा पेश किया । राकेश को इस सब में कोई दिलचस्पी नहीं हुई । चाय पीते हुए उसने लड़के के संबंध में पूछ-ताछ की और फिर उनकी डिमांड आदि के बारे में पूछा तो लड़के के पिता ने उससे उसका इस्टीमेट पूछा । उसके गोल-मोल जवाब देने और दूसरे ढंग से कुरेदने पर लड़के के पिता ने कहा- आजकल बारह-चौदह सोने, चार-पाँच लाख और गाड़ी से क्या होता है ! अब राकेश ने अपनी बात रखी तो लड़के के पिता के चेहरे का रंग उतरने लगा । फिर अचानक लड़के के पिता ने कहा आपने जो अपनी बहन की तीन फोटुएँ दी हैं, वे सब तो बिल्कुल अजीब और अलग-अलग हैं और लड़की दिखा देने की बात की । फिर नए वाले फोटो को ले वे कहने लगे अब इस फोटो को लीजिए, इसमें तो लड़की तो बिल्कुल ठिगनी लग रही है । चेहरा बड़ा और शरीर छोटा लग रहा है । तब राकेश ने बात में फोन पर आगे बात करने और लड़की दिखाने की बात कर आज्ञा माँगी । लौटते समय बार-बार राकेश के मन में एक ही बात घुमड़ रही थी – “खूबसूरती............... देखने वाले.........की नजर.............................................”।