पड़ोस
में गाने बज रहे थे, सुबह से ही । डॉ० कोटनिस को आश्चर्य हुआ क्योंकि इस बड़े शहर
में उन्होंने कभी भी किसी अपार्टमेंट में गाने बजते हुए सुने नहीं थे । वैसे
उन्हें इस शहर में आए अभी कुछ ही दिन हुए थे। बगल में अपार्टमेंट था, बिल्कुल उस
घर की बगल में जहाँ वे किराये में रहते थे । वे दूसरी मंजिल पर रहते थे । बगल के
अपार्टमेंट से उनका रिश्ता बस यह था कि अपार्टमेंट की पहली मंजिल का सामने के
फ्लैट का किचन, हॉल और हाँ बॉथरुम भी उनके बॉलकनी के ठीक सामने पड़ता था । अत: कोई
सामने रहने वाला कुछ गलत न समझ ले, इसलिए वे सामने के कमरे की खिड़कियों के पर्दे
सदा लगाए रहते थे । उन्होंने दिमाग पर बिना अधिक जोर दिए, अपना काम जारी रखा ।
तैयार होकर वे ऑफिस चले गए । ऑफिस से लौटने पर उन्हें अपने प्रश्न का जवाब मिल गया
। अपार्टमेंट के बाहर शुभ विवाह का बोर्ड लगा था। उन्हें कोई आमंत्रण नहीं था । अब
उन्होंने समझा कि अपार्टमेंट वालों के लिए पड़ोसी सिर्फ अपार्टमेंट में रहने वाले
ही होते हैं । दिन बीतते गए।
एक
दिन अचानक रात के दो बजे उनकी नींद टूट गई । सामने वाले फ्लैट से रोने और लोगों के
बोलने के शोरगुल हो रहे थे। उन्होंने फिर सोने की कोशिश की, आखिर वे उनके पड़ोसी तो
थे नहीं । पर जब रोने की आवाजें तेज होने लगीं तो वे अपनी बिल्डिंग से नीचे होकर
उस अपार्टमेंट में उस फ्लैट के सामने जा पहुँचे । कई लोग वहाँ जमा थे । पता चला कि
उस फ्लैट में एक बुजुर्ग महिला और उनके पति रहते हैं । उनकी पुत्री शादी के बाद बगल
के किसी शहर में है । पुत्र दिल्ली में है । बुजुर्ग को शायद दिल का दौरा पड़ा था।
महिला अपने को असहाय पाकर लगातार रो रही थी । पड़ोसी सलाह और तसल्ली देने और किसी
एंबुलेंस की व्यवस्था की जुगत में लगे थे। अचानक डॉ कोटनिस को ख्याल आया कि उनके
सहकर्मी योगेश शर्मा जी का पुत्र बगल के एक बड़े अस्पताल में डॉक्टर है। डॉ० कोटनिस
ने तत्काल शर्मा जी को फोन लगाया और सारी बात समझाई । मिनटों में एंबुलेंस आ गई ।
बुजुर्ग को एंबुलेंस पर लाया गया। उनकी पत्नी एंबुलेंस में उनकी बगल में बैठ गई और
पड़ोसियों की ओर आस भरी नजर दौड़ाई । पर साथ जाने के नाम पर सभी बगलें झाँकनें लगे ।
डॉ० कोटनिस को बात समझ में आते ही ख्याल आया कैसे उनके पिता की तबीयत खराब होने पर
जब उनकी बहन उनके पिता को अस्पताल ले जा रही थी तो उसका साथ देने वाला कोई नहीं
मिला था । वे झट से एंबुलेंस में चढ़ बैठे । डॉ कोटनिस के साथ होने की वजह से
अस्पताल में बुजुर्ग को अति विशिष्ट व्यक्ति की तरह इलाज मिला । सुबह पाँच बजे तक
पीड़ित के पुत्री-दामाद आ पहुँचे । तब डॉ० कोटनिस वापस हो लिए। दो दिनों बाद डॉ०
कोटनिस बुजुर्ग को देखने अस्पताल गए । शर्मा जी के पुत्र ने बताया कि बुजुर्ग की
हालत अब काफी बेहतर थी और वह खुद उनका खास ख्याल रख रहा था। डॉ कोटनिस ने उसे
धन्यवाद किया। जब डॉ० कोटनिस उन बुजुर्ग के पास पहुँचे तो उनके पुत्र-पुत्री ने
उनका बार-बार धन्यवाद किया। डॉ० कोटनिस को एक अभूतपूर्व संतुष्टि की अनुभूति हुई ।
पर बुजुर्ग महिला उन्हें देखकर कुछ सोच रही थी और मानो शर्मिंदा हो रही थी । उसे
ख्याल आ रहा था कि करीब तीन महीने पहले पुत्री की शादी के अवसर पर उन्होंने डॉ०
कोटनिस को आमंत्रित करने की बात की थी तो कैसे उनके पुत्र और पति ने एक स्वर में
कहा था कि वे उनके पड़ोसी थोड़े न हैं !
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